मई-जून
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मई-जून में खुलेंगे तबादलों के द्वार, 20% की सीमा और विधायकों की अनुशंसा को तवज्जो

प्रशासन · मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश में एक बार फिर तबादलों का मौसम आने वाला है। मई-जून में होने वाले स्थानांतरणों के लिए सामान्य प्रशासन विभाग नीति तैयार कर रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने साफ कह दिया है — व्यवस्था पिछले साल जैसी ही रहेगी, बस प्रक्रिया और पारदर्शी होगी।

अप्रैल के अंत तक नीति का प्रारूप कैबिनेट के सामने रखा जाएगा। उसके बाद मई-जून में तबादले शुरू होंगे — और इस बार सारे आदेश ऑनलाइन जारी होंगे।

20% की सीमा — मनमाने तबादलों पर लगाम

सबसे अहम बात यह है कि किसी भी संवर्ग में अधिकतम 20 प्रतिशत तबादले ही किए जा सकेंगे। यानी बड़े पैमाने पर एक साथ अफसरों को इधर-उधर करने की गुंजाइश नहीं रहेगी। विभाग अपनी ज़रूरत के हिसाब से तबादले करेंगे — न कि दबाव में।

विधायकों और मंत्रियों की ओर से लगातार तबादलों की मांग आती रहती है। मुख्यमंत्री ने बैठक में स्पष्ट किया — “ए प्लस नोटशीट” से होने वाले तबादले प्रशासनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं। इसीलिए इस बार तय प्रक्रिया से बाहर जाकर कोई आदेश नहीं होगा।

कौन तय करेगा किसका तबादला?

अधिकारी श्रेणी अनुमोदन किसका?
राज्य संवर्ग — प्रथम श्रेणी CEOs मुख्यमंत्री (समन्वय के माध्यम से)
शेष अधिकारी विभागीय मंत्री
जिले के भीतर स्थानांतरण कलेक्टर — प्रभारी मंत्री के अनुमोदन के बाद

जिले के भीतर होने वाले तबादलों में विधायकों की अनुशंसा को प्राथमिकता दी जाएगी — लेकिन अंतिम फैसला प्रभारी मंत्री का होगा।

तीन साल से एक ही जगह? — पहले आपका नंबर

जो अधिकारी या कर्मचारी तीन वर्ष या उससे अधिक समय से एक ही स्थान पर तैनात हैं, उन्हें इस बार तबादले में प्राथमिकता मिलेगी। यह नियम इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि लंबे समय तक एक ही जगह रहने से स्थानीय दबाव और भ्रष्टाचार की आशंका बढ़ती है।

जनगणना में लगे कर्मचारी — राहत की खबर

भारत सरकार के निर्देशों के अनुसार जनगणना कार्य में लगे मैदानी अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादले नहीं होंगे। यदि किसी का तबादला ज़रूरी हुआ तो आदेश में यह स्पष्ट लिखा जाएगा कि वह जनगणना कार्य पूरा होने के बाद प्रभावी होगा। यानी काम बीच में नहीं रुकेगा।

कुल मिलाकर यह तबादला नीति पिछले साल की तुलना में ज़्यादा व्यवस्थित दिखती है — ऑनलाइन आदेश, तय सीमा और स्पष्ट जवाबदेही। अब देखना यह है कि कागज़ पर बनी यह व्यवस्था ज़मीन पर कितनी ईमानदारी से लागू होती है।

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