मंत्री प्रतिमा बागरी की जाति संबंधी शिकायत पर एससी छानबीन समिति ने सुनवाई की। मंत्री और शिकायतकर्ता दोनों ने दस्तावेज पेश किए, लेकिन समिति ने फिलहाल क…और पढ़ें

मंत्री प्रतिमा बागरी सुनवाई के बाद लोगों से मिलती हुईं। (नईदुनिया प्रतिनिधि)
HighLights
- प्रतिमा बागरी ने समिति के समक्ष कई दस्तावेज प्रस्तुत किए।
- शिकायतकर्ता ने 430 पृष्ठों के दस्तावेज भी सौंपे।
- 1916 के ब्रिटिश गजट का भी हवाला दिया गया।
भोपाल। नगरीय विकास एवं आवास (राज्य मंत्री) प्रतिमा बागरी को अनुसूचित जाति की जगह राजपूत समाज (सामान्य वर्ग) की बताने वाली शिकायत पर सोमवार को एससी मामलों की छानबीन समिति ने मंत्रालय में सुनवाई की। मंत्री ने खुद को एससी बताने के लिए कई प्रमाण दिए तो कुछ आरोपों का मौखिक तौर पर खंडन किया।
उन्होंने समिति के समक्ष 110 वर्ष पुरानी खसरा-खतौनी की नकल प्रस्तुत कर बताया कि इसमें बागरी को कहीं भी राजपूत नहीं बताया गया है न ही उप जाति में उल्लेख है। उनका दूसरा बड़ा तर्क रहा कि बागरी जाति के लोगों को भाजपा ही नहीं खुद कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में एससी सीट से प्रत्याशी बनाया। गुनौर विधानसभा सीट से महेंद्र बागरी और काशी बागरी को प्रत्याशी बनाया था।
सतना जिले की रैगांव सीट से (जहां से प्रतिमा बागरी विधायक हैं) उनके दादा जुगल किशोर बागरी विधायक रहे। उधर, मामले में शिकायतकर्ता कांग्रेस के अनुसूचित विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने 430 पेज के दस्तावेज समिति को सौंपे हैं। इसमें ब्रिटिश काल का 1916 का गजट भी है जो तत्कालीन जनगणना आयुक्त आरबी रसेल ने जारी किया था।
उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में राजपूत होते हैं बागरी
अहिरवार के अनुसार इसमें बागरी जाति के रहन-सहन और सभी राज्यों में सामान्य वर्ग में होने का उल्लेख है। अहिरवार ने अपने पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया कि एससी-एसटी वर्ग में जाति का निर्धारण 1950 के भारत सरकार के गजट के अनुसार होता है, लेकिन इसमें तत्कालीन विंध्य प्रदेश के सतना जिले में बागरी शामिल नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के बांदा, महोबा और महाराष्ट्र का गजट देकर बताया कि बागरी राजपूत में आते हैं।




