भोपाल । राजधानी भोपाल से निकलने वाले कचरे के वैज्ञानिक निष्पादन के लिए बनाई गई आदमपुर कचरा खंती अब आसपास के 10 गांवों के लोगों के लिए गंभीर समस्या बन चुकी है। यहां वैज्ञानिक निष्पादन की जगह सात लाख टन कचरे का पहाड़ खड़ा हो गया है।
कचरे से निकलने वाले लीचेट ने भूजल को दूषित कर दिया है, जबकि बदबू और धुएं से लोगों का सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। हालात ऐसे हैं कि कई गांवों में नगर निगम को टैंकरों और सार्वजनिक पानी की टंकियों के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराना पड़ रहा है।
सात लाख टन कचरे का पहाड़
- राजधानी से निकलने वाले कचरे के वैज्ञानिक निष्पादन के लिए बनाई गई आदमपुर कचरा खंती अब आसपास के 10 गांव के लोगों के लिए मुसीबत बन चुकी है। यहां कचरे का वैज्ञानिक निष्पादन होने की जगह सात लाख टन कचरे का पहाड़ बन चुका है और इससे आने वाली बदबू की वजह से आसपास के गांवों के लोगों का सांस लेना भी मुश्किल हो गया है।
- कचरे के दूषित पानी (लीचेट) का रिसाव भी कचरा खंती से बाहर बह रहा है। इसकी वजह से आसपास के कई गांवों का भूजल भी दूषित हो चुका है। ऐसे में यहां के पानी को पीना तो दूर इसे नहाने सहित अन्य रोजमर्रा के कामों में भी उपयोग नहीं किया जा सकता। कचरा खंती की वजह से इन गांवों में पहले से लगे ट्यूवबेल, हैंडपंप और कुओं का पानी भी खराब हो चुका है।
- हरिपुरा-अर्जुन नगर, पड़रिया, शांति नगर, कोलुआ जैसे गांवों में नगर निगम को इन गांवों में टैंकरों और सार्वजनिक पानी की टंकियों के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से यह व्यवस्था चल रही है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम दिखाई नहीं देता।
- दूसरी ओर, कचरे के पहाड़ में समय-समय पर लगने वाली आग लोगों के लिए नई मुसीबत बन जाती है। आग लगने पर कई किलोमीटर तक फैलने वाला धुआं आंखों में जलन, गले में खराश, सांस लेने में तकलीफ और एलर्जी जैसी समस्याएं पैदा करता है। सबसे ज्यादा परेशानी बच्चों, बुजुर्गों और पहले से अस्थमा या अन्य श्वास रोगों से पीड़ित लोगों को होती है।
ग्रामीण बोले- पीने लायक नहीं बचा पानी
पहले घर के हैंडपंप से पानी भरकर पी लेते थे, लेकिन अब वह पानी पीना तो दूर, घरेलू काम के लायक भी नहीं बचा है। नगर निगम टैंकरों के माध्यम से पानी आपूर्ति करता है, लेकिन 100 परिवारों पर 10,000 लीटर की एक टंकी रखी गई है।
उसे भी दो से तीन दिन में आधा ही भरा जाता है। ऐसे में इस पानी से काम नहीं चल पाता है। कई दिन पानी नहीं आने से दूसरे गांवों से पानी लाना पड़ता है। हवा दूषित होने की वजह से सांस लेने में भी परेशानी होने लगती है, लेकिन अब तो इस दुर्गंध के साथ रहना सीख लिया है। नन्नूलाल सिसोदिया, रहवासी, शांति नगर
पेयजल सहित अन्य दैनिक उपयोग के लिए अब तो टैंकर का पानी ही हमारी जिंदगी का सहारा है। हम यहां के हैंडपंप और कुओं का पानी तो पी भी नहीं सकते हैं। हैंडपंपों से निकलने वाला पानी काला पड़ चुका है, इसलिए हैंडपंप बंद कर दिए गए हैं।
बरसात में कचरे की बदबू और लीचेट की समस्या बढ़ जाती है। धुआं और दुर्गंध से लोगों का घर में रहना मुश्किल हो जाता है। कई परिवारों में खांसी, एलर्जी और सांस की शिकायतें आम हो गई हैं। सुरेश बंजारा, रहवासी, पड़रिया
भूजल में तत्काल सुधार असंभव
- आदमपुर कचरा खंती के आसपास का भूजल लगभग पूरी तरह प्रभावित हो चुका है। अब इसमें तत्काल सुधार का कोई व्यावहारिक उपाय नहीं है। यदि कचरे के इस पहाड़ का पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण कर दिया जाए और भविष्य में यहां आने वाले कचरे का भी वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित किया जाए, तब भी भूजल को प्राकृतिक रूप से सामान्य होने में कई दशक नहीं, बल्कि सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं।
- इस क्षेत्र में उगने वाले अनाज, फल और सब्जियां भी दूषित वातावरण और प्रभावित जल के संपर्क में आती हैं। यही कृषि उत्पाद भोपाल की मंडियों में पहुंचते हैं, इसलिए यह केवल आसपास के गांवों का नहीं, बल्कि राजधानी के उपभोक्ताओं के लिए भी चिंता का विषय है। डॉ सुभाष सी. पांडेय, पर्यावरणविद्
नगर निगम का पक्ष
कचरा खंती की वजह से आसपास के गांवों में नगर निगम द्वारा टैंकरों के माध्यम से नियमित रूप से शुद्ध पानी सप्लाई किया जाता है। हमारा प्रयास है कि जल्द से जल्द कचरा खंती के कचरे को समाप्त किया जा सके। संस्कृति जैन, आयुक्त, नगर निगम




