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मप्र में कांग्रेस के उम्मीदवार पर टिकी भाजपा की नजर, तीसरी सीट पर रणनीति बाद में होगी तय

 

भोपाल। मध्य प्रदेश में जून में होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। प्रदेश की तीन रिक्त हो रही सीटों में से दो सीटें भाजपा और एक सीट कांग्रेस के खाते में जाना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि कांग्रेस की सीट पर उम्मीदवारों को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान और रणनीति पर भाजपा की नजर है।

भाजपा की तैयारी यह है कि कांग्रेस का प्रत्याशी यदि कमजोर रहा तो वह इस पर अपना प्रत्याशी उतार भी सकती है।

जीत के लिए 58 विधायकों के वोटों की जरूरत

बता दें, मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटें हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के 58 विधायकों के वोटों की जरूरत है। अभी प्रदेश में 229 विधायक हैं। एक विधायक को वोट देने का अधिकार नहीं है। एक की निष्ठा संदिग्ध है। ये दोनों कांग्रेस (कुल 64 विधायक) कोटे के हैं।

भाजपा (कुल 164 विधायक) के पास दो सीट के 116 विधायक की पहली प्राथमिकता के बाद 48 विधायक बचते हैं। तीसरी सीट जीतने के लिए उसे आठ विधायकों की आवश्यकता होगी।

संख्या बल का गणित क्या कहता है?

– भाजपा के पास 164 विधायक हैं।

– कांग्रेस के पास 64 विधायक हैं।

– दो सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के बाद भाजपा के पास 48 वोट शेष बचते हैं।

– तीसरी सीट जीतने के लिए भाजपा को करीब 8 अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी।

कमल नाथ आए तो बदल सकती है भाजपा की रणनीति

भाजपा सूत्रों के अनुसार यदि कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ जैसे कद्दावर नेता को उम्मीदवार बनाती है, तो मध्य प्रदेश का सियासी समीकरण और भाजपा की रणनीति पूरी तरह बदल सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कमल नाथ को मैदान में उतारना भले कांग्रेस की मजबूरी कही जाए लेकिन यह एक मास्टर स्ट्रोक साबित हो सकता है।

इससे भाजपा के लिए तीसरी सीट पर सेंधमारी करना नामुमकिन हो जाएगा। फिर भाजपा अपनी दो सीटों पर और कांग्रेस कमल नाथ के रूप में एक सीट पर आसानी से जीत दर्ज करेगी यानी चुनाव निर्विरोध संपन्न हो जाएगा।

सामने आएगा सरप्राइज उम्मीदवार का नाम

दरअसल, भाजपा ने पूर्व में कई राज्यों के राज्यसभा चुनावों में अंतिम क्षणों में अतिरिक्त प्रत्याशी उतारकर विपक्षी दलों के समीकरण बिगाड़े हैं। भाजपा की यह रणनीति बेहद आक्रामक रही है, जहां विधायकों की संख्या कम होने के बावजूद पार्टी ने ऐन वक्त पर सरप्राइज उम्मीदवार उतारा और विपक्षी खेमे में क्रॉस वोटिंग कराकर जीत हासिल की।

हिमाचल प्रदेश में हर्ष महाजन और ओडिशा में दिलीप राय के उदाहरण सामने आ चुके हैं। इन जगहों पर विपक्षी विधायकों की अंतरात्मा की आवाज और क्रॉस वोटिंग के सहारे भाजपा ने अपनी रणनीति को अमली जामा पहनाया लेकिन मध्य प्रदेश में पराजय जैसी राजनीतिक शर्मिंदगी से बचने के लिए भाजपा अपने पत्ते नहीं खोल रही।

अतिरिक्त की प्रत्याशी का अहम रोल रहेगा

भाजपा पहले अपने संपर्क वाले कांग्रेस विधायकों के प्रति आश्वस्त हो लेगी, उसके बाद ही आगे की चुनौती स्वीकार करेगी। भाजपा की यह पुरानी रणनीति रही है कि वह राज्यसभा जैसे उच्च सदन के चुनावों को भी केवल संख्या बल के भरोसे नहीं छोड़ती।

यदि विपक्षी खेमे में थोड़ी भी असंतुष्टि दिखती है, तो पार्टी आखिरी पलों में अतिरिक्त प्रत्याशी उतारकर पूरे चुनाव को दिलचस्प बना देती है। यही वजह है कि मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस पूरी सावधानी बरत रही है।

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