भोपाल। धार्मिक आयोजन के दौरान सीहोर जिले में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध चढ़ाया और 211 साड़ियों का विसर्जन किया गया था। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पर्यावरणीय अपराध माना है। साथ ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) को वैज्ञानिक जांच के आदेश देते हुए जवाब तलब किया है।
एनजीटी की भोपाल स्थिज सेंट्रल जोन बेंच में दायर याचिका में बताया गया कि सीहोर जिले की भैरूंदा तहसील के सतदेव और भैरूंदा गांवों में आयोजित एक धार्मिक सभा के समापन पर आयोजकों ने नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध बहाया गया और 211 साड़ियां विसर्जित की गईं।
इससे नदी का पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है, जिससे जलीय जीवों की मौत, पानी का दूषित होना और आसपास की कृषि भूमि का प्रदूषित होना जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं।
दूध बहाने को प्रतिबंधित करने कोई दिशा-निर्देश नहीं
यह कृत्य जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का सीधा उल्लंघन है। सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में सीपीसीबी के पास विशेष रूप से ‘दूध बहाने’ को प्रतिबंधित करने वाले कोई विशिष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं।
हालांकि, जल अधिनियम, 1974 की धारा 24 के तहत नदियों में किसी भी ऐसी जैविक सामग्री को डालने की मनाही है जो पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड को बढ़ाती है और ऑक्सीजन का स्तर कम करती है।
जलीय जीवन को पहुंचता है नुकसान
एनजीटी ने सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आदेश दिया गया है कि वे विशेषज्ञों के माध्यम से वैज्ञानिक डेटा एकत्र करें। यह जांच की जाए कि क्या अनुष्ठानों के दिन नदी में इतनी बड़ी मात्रा में दूध बहाने से पानी प्रदूषित होता है और क्या इससे जलीय जीवन को नुकसान पहुंचता है। वहीं, दोनों बोर्ड को यह रिपोर्ट सौंपनी होगी कि क्या इस प्रकार की गतिविधियों को विनियमित करने के लिए नए नियमों या दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है। मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।




