अधिकारियों की राय: हालांकि विभागीय सूत्रों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए इस याचिका से राहत मिलने की उम्मीदें सीमित हैं, लेकिन शिक्षकों के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए सरकार यह अंतिम कानूनी प्रयास कर रही है। यदि कोर्ट इस दलील को मान लेता है, तो परीक्षा के दायरे में आने वाले कुल शिक्षकों में से लगभग आधे को सीधी राहत मिल जाएगी।
विवाद की पृष्ठभूमि: क्यों अनिवार्य हुई परीक्षा?
यह पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2025 के उस ऐतिहासिक फैसले के बाद शुरू हुआ, जिसमें कोर्ट ने साफ किया था कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून, 2009 के लागू होने से पहले (यानी 1998 से 2009 के बीच) नियुक्त हुए उन सभी शिक्षकों को TET पास करना अनिवार्य होगा, जिनकी सेवा अवधि अभी 5 साल से अधिक बची है।
इस आदेश के अनुपालन में लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) ने निर्देश जारी कर जुलाई-अगस्त में परीक्षा आयोजित करने का फैसला किया है। यदि कोई शिक्षक इस तय सीमा में परीक्षा पास नहीं कर पाता है, तो उसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति (वीआरएस) दे दी जाएगी।
कोर्ट से मिली आंशिक राहत
शिक्षक संगठनों और सरकार के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नियमों में ढील तो नहीं दी, लेकिन दो महत्वपूर्ण आंशिक राहतें जरूर दी हैं:
1. समय-सीमा बढ़ी: पहले TET पास करने की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2027 तय की गई थी, जिसे अब बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दिया गया है।
2. असीमित अवसर: जो शिक्षक पहली बार में परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाएंगे, उन्हें अगस्त 2028 तक आयोजित होने वाली हर पात्रता परीक्षा में बैठने का मौका मिलेगा।
3. वरिष्ठों को छूट: जिन शिक्षकों के रिटायरमेंट में 5 वर्ष से कम का समय बचा है, उन्हें इस परीक्षा से पूरी तरह मुक्त रखा गया है।
65 से अधिक याचिकाएं खारिज, कोर्ट का कड़ा रुख
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख शुरू से ही बेहद सख्त रहा है। अदालत अब तक राज्य सरकारों, विभिन्न संगठनों और व्यक्तिगत तौर पर दायर 65 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर चुकी है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तल्ख और स्पष्ट टिप्पणियां की थीं:
संसद की मंशा सर्वोपरि: आरटीई एक्ट में पहले से व्यवस्था है कि सेवा में मौजूद शिक्षकों को भी तय समय में न्यूनतम योग्यता हासिल करनी होगी। संसद चाहती थी कि देश के सभी शिक्षक न्यूनतम मानकों को पूरा करें।
भविष्य से समझौता नहीं: केवल नौकरी जाने की आशंका के आधार पर इस फैसले को बदला नहीं जा सकता। बिना योग्यता (नॉन-टीईटी) वाले शिक्षकों के सेवा में बने रहने का सीधा असर आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा पर पड़ेगा।
नियमों से ऊपर मूल कानून: नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन की अधिसूचनाएं या कोई भी अधीनस्थ नियम मूल कानून से ऊपर नहीं हो सकते।
व्यापमं के माध्यम से हुई नियुक्तियों का इतिहास
मध्य प्रदेश में संविदा और अध्यापक कैडर के तहत व्यापमं के माध्यम से अलग-अलग चरणों में भर्तियां की गई थीं:
वर्ष 2005-06: स्कूल शिक्षा विभाग ने पहली बार व्यापमं के माध्यम से व्यापक स्तर पर शिक्षकों की भर्ती परीक्षा आयोजित की।
वर्ष 2008-09: दोबारा व्यापमं के जरिए परीक्षा कराकर बड़ी संख्या में नियुक्तियां की गईं (इन्हीं दो चरणों के शिक्षकों को बचाने की कोशिश हो रही है)।
वर्ष 2010-11 और 2012-13: इस दौरान गुरुजी और अनुदेशकों के लिए विशेष परीक्षा आयोजित की गई, जिसके बाद उन्हें अध्यापक संवर्ग में समाहित किया गया था।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
इस पूरे मामले को लेकर प्रदेश में सियासत भी गरमा गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अरुण सुभाष चंद्र यादव ने इस पूरे घटनाक्रम और सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। शिक्षक संगठनों का भी कहना है कि करियर के बीच में इस तरह से सेवा शर्तों में बदलाव करना और परीक्षा के लिए मजबूर करना पूरी तरह अनुचित है।




