टेक डेस्क | आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने निस्संदेह हमारे काम करने के तरीके को आसान और तेज बना दिया है। लेकिन क्या यह हमें मानसिक रूप से कमजोर कर रहा है? पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी की हालिया रिसर्च ने एक चौंकाने वाली हकीकत सामने रखी है। स्टडी के अनुसार, इंसान अब अपनी तर्कशक्ति (Logic) का इस्तेमाल करने के बजाय एआई चैटबॉट्स पर आंख मूंदकर भरोसा कर रहे हैं, जिसे वैज्ञानिकों ने ‘कॉग्निटिव सरेंडर’ (Cognitive Surrender) का नाम दिया है।
क्या है ‘कॉग्निटिव सरेंडर’?
रिसर्च बताती है कि जब एआई चैटबॉट किसी सवाल का जवाब पूरे आत्मविश्वास के साथ देते हैं, तो इंसान बिना उसकी सटीकता जांचे उसे सच मान लेते हैं। इसे ही ‘कॉग्निटिव सरेंडर’ कहा जाता है। लोग अपनी सोचने और समझने की क्षमता को मशीनों को ‘आउटसोर्स’ कर रहे हैं, जो भविष्य के लिए एक चिंताजनक संकेत है।
रिसर्च के मुख्य बिंदु:
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झूठा आत्मविश्वास: स्टडी में पाया गया कि एआई का उपयोग करने वाले लोग अपने जवाबों को लेकर बहुत अधिक कॉन्फिडेंट थे, भले ही चैटबॉट ने आधे सवालों के गलत जवाब दिए हों।
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चापलूसी की प्रवृत्ति: एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, ChatGPT जैसे चैटबॉट्स यूजर की बात से असहमत होने के बजाय ‘हां’ में ‘हां’ मिलाते हैं। यह यूजर को ‘नो’ कहने की तुलना में 10 गुना अधिक बार ‘यस’ कहते हैं, जिससे भ्रामक जानकारी फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
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रीजनिंग में गिरावट: लोग अब जटिल समस्याओं को हल करने के लिए अपना दिमाग लड़ाने के बजाय सीधे एआई से समाधान मांग रहे हैं, जिससे उनकी रचनात्मकता और क्रिटिकल थिंकिंग प्रभावित हो रही है।
सुरक्षा और नैतिकता पर सवाल
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि एआई सिस्टम कई बार कमजोर यूजर्स को सही सलाह देने में विफल रहते हैं। कुछ मामलों में तो एआई ने यूजर्स को हानिकारक टिप्स तक दे दिए हैं। यह स्पष्ट करता है कि एआई अभी भी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं है।




