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‘हमारा नाम भी सूरमा भोपाली ऐसेई नईं है…’ आखिर कौन था असली सूरमा भोपाली, जिसने शोले के अमर किरदार को जन्म दिया?

 

डिजिटल डेस्क। ‘मियां, नाम तो सुना ही होगा हमारा… सूरमा भोपाली! ना जाने कहां-कहां से लोग चले आते हैं हमसे मिलने।’

शोले का यह संवाद सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। जगदीप की आवाज कानों में गूंजने लगती है और आंखों के सामने भोपाली लहजे में शेखी बघारता एक दिलचस्प किरदार खड़ा हो जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस किरदार की जड़ें मुंबई के किसी स्टूडियो में न होकर भोपाल की गलियों में थीं। वहां एक ऐसा शख्स रहता था, जिसकी बातें, गुस्सा, अंदाज और दोस्ती के किस्से आज भी लोगों की यादों में जिंदा हैं।

उस शख्स का नाम था नाहर सिंह बघेल।

कहानी नाहर सिंह बघेल के सूरमा भोपाली बनने की….

कहानी साठ के दशक के भोपाल से शुरू होती है। उस दौर का भोपाल आज की तरह भागता-दौड़ता शहर नहीं था। लोग एक-दूसरे को नाम से नहीं, रिश्तों से जानते थे। कोई चाचा था, कोई मामा। नाहर सिंह भी ऐसे ही लोगों के बीच ‘नाहर मामा’ और ‘काले मामा’ के नाम से मशहूर थे।

 

वे भोपाल म्युनिसिपलिटी में नाकेदार थे। प्रोफेसर कॉलोनी में उनका बंगला था और उनकी दोस्ती शहर के हर तबके में थी। हिंदू, मुस्लिम, अमीर, गरीब, नेता, कलाकार सब उनके दोस्त थे। शायद यही वजह थी कि वे भोपाल की गंगा-जमुनी तहजीब का चलता-फिरता प्रतीक माने जाते थे। लेकिन नाहर मामा की सबसे बड़ी पहचान उनका स्वभाव था।

कद मुश्किल से पांच फीट। शरीर सामान्य, लेकिन गुस्सा ऐसा कि हर वक्त नाक पर बैठा रहता था। किसी को गलत बोलते सुन लिया तो तुरंत भिड़ जाते। किसी ने दोस्त की बेइज्जती कर दी तो सामने खड़े हो जाते। कई बार उनकी इसी आदत की वजह से दोस्तों को भी लड़ाई लड़नी पड़ जाती थी।

उनके पुराने दोस्त और वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली बताते थे कि जब भी नाहर मामा किसी विवाद में कूद पड़ते तो दोस्त झल्लाकर कहते, ‘बड़े सूरमा बने फिरते हो’। धीरे-धीरे यही तंज उनका नाम बन गया और पूरा शहर उन्हें सूरमा भोपाली कहने लगा।

दोस्त जावेद अख्तर से भिड़ गए…

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इधर भोपाल में नाहर मामा अपने अंदाज से मशहूर हो रहे थे, उधर उनके मित्र जावेद अख्तर जिंदगी में आगे बढ़ रहे थे। कॉलेज के दिनों की दोस्ती समय के साथ दूर जरूर हुई, लेकिन यादें कहीं न कहीं साथ रहीं। फिर 1975 में शोले रिलीज हुई। फिल्म में एक छोटा-सा किरदार था सूरमा भोपाली। जगदीप ने उसे पर्दे पर ऐसा जिया कि वह भारतीय सिनेमा के इतिहास का हिस्सा बन गया। फिल्म के बड़े-बड़े नायक थे, लेकिन सूरमा भोपाली का नाम भी दर्शकों की जुबान पर चढ़ गया।

हालांकि शोले देखने के बाद नाहर सिंह को लगा कि यह किरदार कहीं न कहीं उनसे मिलता-जुलता है। इस बात को लेकर उन्होंने जावेद अख्तर के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी शुरू की। उनके मित्र और अधिवक्ता मोहम्मद अली ने उनकी ओर से मुकदमा दायर किया था। बाद में मामला शांत हो गया और केस वापस ले लिया गया।

दिलचस्प बात यह है कि 2017 में भोपाल के एक कार्यक्रम में जावेद अख्तर ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि सूरमा भोपाली का चरित्र उनके कॉलेज के दिनों के एक मित्र से प्रेरित था। इसके बाद पुराने किस्से फिर चर्चा में आ गए।

नाहर मामा का एक और रूप भी था, जिसे कम लोग जानते हैं। वे अच्छे गायक थे और आकाशवाणी में कैजुअल आर्टिस्ट के रूप में भी काम कर चुके थे। संगीत, दोस्ती और महफिलें उन्हें बेहद पसंद थीं। उनकी मौजूदगी से किसी भी बैठक में रौनक आ जाती थी।

इतिहास का यादगार किरदार बन गए सूरमा भोपाल

19 नवंबर 1979 को एक सड़क दुर्घटना में नाहर सिंह बघेल का निधन हो गया। वे गांव से शहर लौट रहे थे, तभी हादसे का शिकार हो गए। लेकिन कुछ लोग मौत के बाद भी नहीं जाते। नाहर सिंह बघेल भी उन्हीं लोगों में से एक हैं।

आज उनकी आवाज सुनाई नहीं देती, उनका गुस्सा दिखाई नहीं देता, उनकी महफिलें नहीं सजतीं। लेकिन जब भी टीवी पर जगदीप की आवाज गूंजती है। ‘हमारा नाम भी सूरमा भोपाली ऐसेई नईं है…’, तो लगता है कि भोपाल की किसी पुरानी गली से नाहर मामा आज भी मुस्कुराते हुए चले आ रहे हैं। और शायद यही किसी इंसान की सबसे बड़ी जीत होती है कि वह इतिहास के सबसे यादगार किरदारों में हमेशा जिंदा रहे।

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