भोपाल। कई हाथियों ने मध्य प्रदेश को अपना स्थायी घर बना लिया है। पिछले वर्षों में बाधंवगढ़ सहित अन्य स्थानों पर हाथियों के उपद्रव और उनकी मृत्यु की घटनाओं से सबक लेते हुए प्रदेश का वन अमला बंगाल में जंगली हाथियों का प्रबंधन सीख रहा है।
इससे पहले ओडिशा, कर्नाटक और असम में भी हाथियों के प्रबंधन का अध्ययन कर आया है। साथ ही सुरक्षा और निगरानी सुनिश्चित करने के लिए छह हाथियों को रेडियो कॉलर लगाए जाएंगे। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने इसकी अनुमति दे दी है।
महावत के पद बढ़ेंगे
प्रदेश में सहायक महावत के पद भी बढ़ाए जाएंगे। प्रदेश में वर्तमान में 90 से अधिक हाथी हैं। इधर, बांधवगढ़ में 10 हाथियों की असमय मौत के बाद राज्य में राज्य स्तरीय हाथी टास्क फोर्स का गठन किया गया है ताकि इंसानों और हाथियों के बीच संघर्ष को रोका जा सके। हाथियों को सुरक्षित माहौल मिल सके।
डीएनए सैंपल से होगी पहचान
हाथियों के डीएनए सैंपल लेकर रखा जा रहा रिकॉर्ड मध्य प्रदेश के जंगल में विचरण कर रहे हाथियों की पहचान के लिए उनका डीएनए सैंपल लेकर रिकॉर्ड रखा जा रहा है। इनमें वे हाथी हैं जिन्होंने स्थायी रूप से प्रदेश को अपना घर बना लिया है।
वन विभाग अपने स्वामित्व वाले हाथियों से जंगल में गश्त आदि कार्य करता है। इन पालतू हाथियों के संरक्षण के लिए यह कदम उठाया गया है तथा उनकी पहचान एवं लोकेशन भी सुनिश्चित की गई। इन योजनाओं से हाथियों की सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी।
हाथी शेड्यूल -1 का संरक्षित प्राणी, एनटीसीए की अनुमति अनिवार्य
– हाथियों को रेडियो कॉलर या कॉलर आईडी पहनाने के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) से अनुमति लेना कानूनी और वैज्ञानिक रूप से अनिवार्य है।
– वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (2022 में संशोधित) के तहत यह कानूनी अनिवार्यता है।
– हाथी, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल एक संरक्षित और लुप्तप्राय प्रजाति है। इस कानून के तहत किसी भी अनुसूची-1 के जानवर को पकड़ना, बेहोश करना (ट्रेंक्यूलाइज) या उसके शरीर पर कोई उपकरण लगाने से पहले एनटीसीए से अनुमति लेना अनिवार्य है।
– हाथी अगर टाइगर रिजर्व में है तो उसके लिए एनटीसीए अनुमति देता है।
– अगर टाइगर रिजर्व के बाहर हाथी है उनके लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के डीजी फारेस्ट की अनुमति अनिवार्य होती है।




