Publisher: Agrasar India | News Desk
स्थान: भोपाल, मध्य प्रदेश
तारीख: 22 जुलाई 2026
भोपाल: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की भोपाल स्थित सेंट्रल जोन पीठ (न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह और सुधीर कुमार चतुर्वेदी) ने नदियों में दूध अर्पित करने के मामले पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। एनजीटी ने स्पष्ट किया कि नदियों में दूध अर्पित करना लोगों की धार्मिक आस्था का विषय है और इसके खिलाफ देश में कोई निषेधात्मक कानून नहीं है।
हालांकि, ट्रिब्यूनल ने सख्त लहजे में सचेत किया है कि आस्था के नाम पर एक साथ हजारों लीटर दूध नदियों में बहाने से जलीय पारिस्थितिकी (Aquatic Ecosystem) को भारी नुकसान पहुँच सकता है। इसलिए आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है।
मामला क्या था?
यह आदेश सीहोर जिले के भेरूंदा (सातदेव स्थित दादाजी दरबार पातालेश्वर महादेव मंदिर) में अप्रैल 2026 में हुए एक 21 दिवसीय अनुष्ठान के बाद जारी किया गया। इस आयोजन के समापन पर टैंकरों के जरिए लगभग 11 हजार लीटर दूध नर्मदा नदी में प्रवाहित किया गया था, जिसको लेकर पर्यावरणीय चिंताएं उठाई गई थीं।
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच रिपोर्ट के अनुसार, नर्मदा नदी का प्रवाह तेज होने के कारण उस समय पानी में कोई दीर्घकालिक जहरीला प्रभाव नहीं देखा गया और नदी की ‘सेल्फ-प्यूरिफिकेशन’ (स्व-शोधन) प्रक्रिया से स्थिति संभल गई। लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि पानी का बहाव धीमा हो या पानी ठहरा हुआ हो, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है।
वैज्ञानिक प्रमाण: आखिर क्यों नदी के पानी के लिए हानिकारक है दूध?
आम तौर पर दूध को शुद्ध माना जाता है, लेकिन जब इसे बड़ी मात्रा में नदी के पानी में बहाया जाता है, तो यह एक गंभीर जैविक प्रदूषक (Organic Pollutant) बन जाता है। इसके पीछे मुख्य वैज्ञानिक कारण निम्नलिखित हैं:
1. BOD (बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड) का तेजी से बढ़ना
दूध में भारी मात्रा में वसा (Fat), प्रोटीन और लैक्टोज (Lactose) मौजूद होते हैं। जब दूध नदी के पानी में मिलता है, तो पानी में मौजूद बैक्टीरिया इस ऑर्गेनिक मैटर को तोड़ने और पचाने के लिए पानी में घुली हुई ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) का तेजी से इस्तेमाल करने लगते हैं। इससे पानी का BOD स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है और घुली हुई ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिर जाता है।
2. ‘हाइपोक्सिया’ और जलीय जीवों का दम घुटना
पानी में ऑक्सीजन की भारी कमी होने की स्थिति को वैज्ञानिक भाषा में हाइपोक्सिया (Hypoxia) कहा जाता है। इसके कारण नदी में रहने वाली मछलियां, कछुए और सूक्ष्म जलीय जीव सांस न ले पाने के कारण दम घुटने से मरने लगते हैं।
3. यूट्रोफिकेशन (Eutrophication) और शैवाल (Algae) का विस्फोट
दूध में फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जैसे पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं। पानी में अत्यधिक पोषक तत्व मिलने से हानिकारक नीले-हरे शैवाल (Algal Bloom) की अनियंत्रित वृद्धि होने लगती है। यह शैवाल पानी की सतह को ढक लेते हैं, जिससे सूर्य की रोशनी पानी के नीचे तक नहीं पहुँच पाती और जल का संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो जाता है।
भविष्य के लिए NGT के प्रमुख दिशा-निर्देश
एनजीटी ने भविष्य में ऐसे आयोजनों को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कड़े निर्देश दिए हैं:
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पूर्व निर्धारित स्थान: बड़े धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजनों के लिए प्रशासन पहले से अलग कुंड या स्थान निर्धारित करे, ताकि मुख्य नदी की धारा प्रभावित न हो।
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अनुमति अनिवार्य: किसी भी बड़े आयोजन में पूजन सामग्री या दूध अर्पण के लिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस से पहले मंजूरी लेना अनिवार्य होगा।
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वेस्ट मैनेजमेंट: पूजन सामग्री, फूल-पत्तियां और अन्य अवशेषों को नदी में बहाने के बजाय तटों पर अलग से एकत्रित करने के लिए ‘कलेक्शन बिन’ बनाए जाएं।
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कड़ी निगरानी: मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ऐसे धार्मिक पर्वों और आयोजनों पर नदी के जल की गुणवत्ता (Water Quality) की लगातार मॉनिटरिंग करने के निर्देश दिए गए हैं।




